वित्तीय स्थिरता किसी देश की वित्तीय प्रणाली की वह स्थिति है जिसमें बैंक, वित्तीय संस्थान, और पूंजी बाजार बिना बड़े व्यवधान के सुचारु रूप से कार्यरत रहते हैं। इसे समझना आवश्यक है क्योंकि वित्तीय प्रणाली की अस्थिरता आर्थिक विकास को प्रभावित करती है और पूरे देश की आर्थिक सेहत पर बुरा प्रभाव डालती है।
इस अध्याय में हम वित्तीय स्थिरता की अवधारणा, इसके महत्त्व, RBI नीति व बैंकिंग विनियमन, NPA का परिचय, डिजिटल बैंकिंग के नवाचार एवं वित्तीय प्रणाली की प्रमुख चुनौतियों पर समग्र चर्चा करेंगे।
वित्तीय स्थिरता (Financial Stability) वह अवस्था है जब वित्तीय संस्थान, बाज़ार और भुगतान प्रणाली ऐसे कार्य करती हैं कि वे आंतरिक या बाहरी आर्थिक सदमे सह सकते हैं और समग्र आर्थिक विकास में योगदान दे सकते हैं।
वित्तीय स्थिरता के अभाव में बैंकिंग संकट, मुद्रा स्फीति, ऋण डिफ़ॉल्ट्स, और आर्थिक मंदी जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। अतः वित्तीय स्थिरता देश की आर्थिक समृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत का केंद्रीय बैंक है, जो बैंकिंग प्रणाली की नीतियां तय करता है, बैंकिंग संस्थानों पर नियंत्रण रखता है और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता है।
graph TD RBI[भारतीय रिजर्व बैंक] RBI --> MonetaryPolicy[मुद्रा नीति] RBI --> BankingRegulation[बैंकिंग विनियमन] RBI --> FinancialStability[वित्तीय स्थिरता] MonetaryPolicy --> InflationControl[मुद्रास्फीति नियंत्रण] BankingRegulation --> Supervision[सुपरविजन] FinancialStability --> EconomicGrowth[आर्थिक विकास]
बेसल मानक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैंकिंग संस्थानों के लिए पूंजी पर्याप्तता (Capital Adequacy) के नियम हैं। ये मानक बैंक को निर्धारित पूंजी के साथ सुरक्षित बनाने के लिए लागू किए जाते हैं।
गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (Non-Performing Assets - NPA) वे ऋण होते हैं जिनका ब्याज या मूलधन 90 दिनों (तीन महीने) से अधिक अवधि तक भुगतान नहीं हुआ हो। NPA बैंकिंग प्रणाली की कमजोरी को इंगित करते हैं।
सिक्योरिटाइजेशन एंड रिस्ट्रक्चरिंग ऑफ़ फाइनेंशियल एस्सेट्स एंड एन्हांसमेंट ऑफ सिक्योरिटीज़ एक्ट, 2002 (SARFAESI Act) बैंक एवं वित्तीय संस्थानों को ऋण डिफॉल्टर्स की परिसंपत्तियाँ जब्त करने की कानूनी शक्ति प्रदान करता है। इसके अंतर्गत उन्हें बिना कोर्ट के जल्दी कार्रवाई करने का अधिकार मिलता है।
IBC, 2016 एक समग्र विधि है जो दिवालियापन और ऋण वसूली के मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाने हेतु लागू किया गया है। यह बैंकों और देनदारों के बीच न्यायसंगत समाधान सुनिश्चित करता है।
डिजिटल बैंकिंग का अर्थ है उपकरणों, इंटरनेट के माध्यम से वित्तीय सेवाओं को प्राप्त करना जैसे मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग इत्यादि। यह पारंपरिक बैंकिंग की तुलना में तेज, सुरक्षित और सुलभ है।
| विशेषता | UPI (Unified Payment Interface) | NACH (National Automated Clearing House) |
|---|---|---|
| प्रकार | रियल-टाइम पेमेंट | मासिक या आवधिक सुदृढ़करण |
| उपयोग | छोटे बैंकों और व्यक्तियों के बीच त्वरित भुगतान | वेतन, पेंशन, कर वसूली के लिए स्वचालित भुगतान |
| प्रक्रिया | मोबाइल और ऐप आधारित तत्काल भुगतान | बैंक खातों के बीच जमा-निकासी |
| लाभ | तत्काल, कम शुल्क, सरल इंटरफेस | स्रोत-आधारित मासिक ट्रांजेक्शन |
डिजिटल बैंकिंग में सुरक्षा के लिए उन्नत एन्क्रिप्शन, दो-चरणीय प्रमाणीकरण और नियमित धोखाधड़ी निगरानी प्रणालियाँ लागू होती हैं। यह सुनिश्चित करता है कि उपयोगकर्ता के धन और डेटा की रक्षा सुरक्षित रूप से हो।
चरण 1: NPA अनुपात का सूत्र याद करें।
\[ \text{NPA अनुपात} = \frac{\text{NPA की कुल राशि}}{\text{कुल ऋण}} \times 100 \]
चरण 2: राशि भरें।
\[ = \frac{40}{500} \times 100 = 8\% \]
उत्तर: बैंक का NPA अनुपात 8% है।
चरण 1: कुल पूंजी निकालें।
Rs.100 करोड़ + Rs.50 करोड़ = Rs.150 करोड़
चरण 2: CAR का सूत्र याद करें।
\[ \text{CAR} = \frac{\text{कुल पूंजी}}{\text{जोखिम-भारित संपत्ति}} \times 100 \]
चरण 3: सूत्र में राशि भरें।
\[ = \frac{150}{1000} \times 100 = 15\% \]
उत्तर: बैंक का CAR 15% है, जो विनियमित न्यूनतम सीमा से अधिक है।
चरण 1: SARFAESI अधिकारों की समीक्षा करें।
बैंक बिना न्यायालय के हस्तक्षेप के सीधे ग्राहक की गिरवी संपत्तियों को जब्त कर सकता है और उनका नीलामी कर वसूली कर सकता है।
चरण 2: ऋण डिफॉल्टर से शीघ्र वसूली हेतु यह विधि प्रभावी है।
उत्तर: बैंक SARFAESI अधिनियम के तहत गिरवी वस्तुएं जब्त करके पुनर्भुगतान कर सकता है।
चरण 1: RBI अपनी मुद्रा नीति के माध्यम से ब्योरे पर नियंत्रण रखता है।
चरण 2: ब्याज दरों को बदलकर ऋण और निवेश को नियंत्रित करता है।
चरण 3: बैंकिंग संस्थानों की पूंजी एवं तरलता की निगरानी करता है।
उत्तर: RBI के नियामक एवं मौद्रिक उपाय आर्थिक विकास को बढ़ावा देकर वित्तीय स्थिरता बनाए रखते हैं।
चरण 1: UPI रियल-टाइम इंटरनेट पेमेंट सिस्टम है, जो त्वरित लेन-देन को संभव बनाता है।
चरण 2: NACH आवधिक और नियोजित भुगतान प्रणाली है, जिसमें भुगतान कुछ दिनों में पूरा होता है।
उत्तर: UPI त्वरित भुगतान प्रणाली है क्योंकि यह तत्काल लेन-देन की सुविधा प्रदान करता है।
When to use: बैंकिंग प्रश्नों में NPA अनुपात पूछे जाने पर सटीक जवाब के लिए।
When to use: बैंकिंग विनियमन से संबंधित प्रश्नों का त्वरित समाधान हेतु।
When to use: डिजिटल भुगतान प्रणालियों के प्रश्नों में तेजी से अंतर ज्ञात करने के लिए।
When to use: मांगपत्र और अधिनियम संबंधी प्रश्नों में सही विकल्प चुनने के लिए।
When to use: RBI नीति-आधारित विश्लेषण या विस्तृत प्रश्नों में।
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