पूर्ति सिद्धांत (Law of Supply) अर्थशास्त्र की वह आधारशिला है जो उपभोक्ताओं को उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा को मूल्य के आधार पर समझाती है। इसका मूल उद्देश्य यह बताना है कि किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर उसके उत्पादक उसे अधिक मात्रा में बाजार में उपलब्ध कराते हैं, और कीमत घटने पर इसकी पूर्ति कम हो जाती है। इसके द्वारा हम अर्थव्यवस्था में वस्तुओं के उत्पादन की प्रवृत्तियों को समझ सकते हैं। पूर्ति सिद्धांत उपभोक्ता व्यवहार के विपरीत पूर्ति पक्ष की गतिविधियों पर केंद्रित होता है, इसलिए यह माँग सिद्धांत से अंतर रखता है।
पूर्ति का अंतःप्राय यह है कि किसी वस्तु या सेवा को एक विशेष मूल्य पर बाजार में उपलब्ध कराना। यह किसी उत्पादक या विक्रेता की उस वस्तु की मात्रा को प्रकट करता है, जिसे वह निर्धारित मूल्य पर बिक्री के लिए पेश करता है।
| पूर्ति के घटक | विवरण |
|---|---|
| परिभाषा | किसी वस्तु की वह मात्रा जो एक विशेष मूल्य पर उपलब्ध कराई जाती है। |
| आधारभूत मान्यताएँ | मूल्य एवं पूर्ति के बीच सकारात्मक संबंध। |
| अर्थशास्त्रीय महत्त्व | बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता और उत्पादन को समझने में सहायक। |
जब माँग सिद्धांत बताता है कि मूल्य घटने पर मांग बढ़ती है, पूर्ति सिद्धांत बताता है कि मूल्य बढ़ने पर ही पूर्ति बढ़ेगी। इस विरोधाभास को समझना आवश्यक है।
पूर्ति कार्य (Supply Function) किसी वस्तु की मूल्य, उत्पादन लागत, प्रौद्योगिकी, एवं सरकारी नीतियों जैसे विभिन्न कारणों के आधार पर उसके उपलब्ध मात्रा को निरूपित करता है। इसको गणितीय रूप में व्यक्त किया जाता है:
कुल मिलाकर, पूर्ति कार्य बताता है कि उत्पादक किस कीमत पर कितनी मात्रा में वस्तु बाजार में लायेंगे।
पूर्ति का नियम कहता है कि अन्य सभी कारक समान रहते हुए, किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि से उसकी पूर्ति बढ़ती है, और कीमत में कमी से पूर्ति घटती है। इसे समीकरण के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:
यह सकारात्मक संबंध समझाता है कि कीमत बढ़ने पर उत्पादक वस्तु का उत्पादन अधिक करके बाजार में उपलब्ध कराते हैं।
कीमत लोच पूर्ति की मात्रा में कीमत परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है। इसका सूत्र है:
यह बताता है कि कीमत में 1% वृद्धि पर पूर्ति कितने प्रतिशत बढ़ेगी।
उन्नत प्रौद्योगिकी के कारण उत्पादन की लागत घटती है, जिससे उत्पादक अपनी पूर्ति बढ़ा सकते हैं।
उत्पादन लागत कम होना
अधिक वस्तु उपलब्ध कराना
कीमत में स्थिरता या कमी
पूर्ति की मात्रा हमेशा अनंत नहीं होती; उत्पादन संसाधन, समय, और प्रौद्योगिकी की सीमाएँ पूर्ति को निर्धारित करती हैं।
Step 1: प्रारंभिक मात्रा \( Q_1 = 200 \), नई मात्रा \( Q_2 = 240 \)
Step 2: मात्रा में परिवर्तन \( \Delta Q_s = Q_2 - Q_1 = 240 - 200 = 40 \)
Answer: पूर्ति में वृद्धि 40 यूनिट है।
Step 1: कीमत का प्रतिशत परिवर्तन \( \% \Delta P = 10\% \)
Step 2: पूर्ति का प्रतिशत परिवर्तन \( \% \Delta Q_s = 25\% \)
Step 3: कीमत लोच सूत्र: \( E_s = \frac{25\%}{10\%} = 2.5 \)
Answer: पूर्ति की कीमत लोच 2.5 है।
Step 1: लागत वृद्धि का अर्थ है उत्पादक के लिए उत्पादन महँगा हो जाना।
Step 2: उदाहरण: कपास की कीमत बढ़ने से वस्त्र निर्माता उत्पादन कम कर सकते हैं।
Step 3: अतः लागत वृद्धि पूर्ति को कम करती है क्योंकि लाभ में कमी आती है।
Answer: उत्पादन लागत वृद्धि से पूर्ति घटती है।
Step 1: सब्सिडी का अर्थ उत्पादक को लागत में छूट मिलना है।
Step 2: उदाहरण के लिए, सब्सिडी मिलने से उत्पादन लागत घटती है।
Step 3: उत्पादन बढ़ेगा और बाजार में पूर्ति बढ़ेगी।
Answer: सब्सिडी से पूर्ति में वृद्धि होती है।
Option A: कीमत बढ़ने पर पूर्ति घटती है। (गलत)
Option B: कीमत घटने पर पूर्ति बढ़ती है। (गलत)
Option C: कीमत बढ़ने पर पूर्ति बढ़ती है। (सही)
Option D: कीमत से पूर्ति का कोई संबंध नहीं होता। (गलत)
Answer: Option C सही है क्योंकि पूर्ति नियम के अनुसार कीमत और पूर्ति में सकारात्मक संबंध होता है।
When to use: जब पूर्ति और कीमत के बीच संबंध पूछा जाए।
When to use: लागत और पूर्ति के प्रश्नों में।
When to use: समीकरण पूछे जाने पर।
When to use: सरकारी नीतियों के प्रभाव के सवाल में।
When to use: पूर्ति की लोच के सवालों में।
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