बाल विकास के क्षेत्र में संज्ञानात्मक विकास का अध्ययन यह समझने में सहायक होता है कि बच्चे किस प्रकार अपनी सोच, समझ और ज्ञान की संरचना करते हैं। स्विस मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे (Jean Piaget) ने संज्ञानात्मक विकास के एक व्यवस्थित सिद्धांत का विकास किया, जिसने बच्चों के सोचने के तरीके को उनकी उम्र के अनुसार विभाजित किया। इस सिद्धांत ने यह स्पष्ट किया कि बच्चे सभी ज्ञान अपने पर्यावरण से सक्रिय रूप से प्राप्त करते हैं और इसके लिए वे मानसिक संरचनाओं का उपयोग करते हैं जिनमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है।
संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) का अर्थ है किसी व्यक्ति की सोच, समस्या-समाधान, ध्यान, स्मृति, भाषा और निर्णय लेने की क्षमताओं का विकास। यह विकास मस्तिष्क की परिपक्वता के साथ-साथ अनुभवों से लगातार बढ़ता है। सरल शब्दों में, संज्ञानात्मक विकास यह बताता है कि हम दुनिया को समझने, ज्ञान संग्रहीत करने और उसका उपयोग करने के तरीके कैसे सीखते हैं।
पियाजे के अनुसार, बच्चे जन्म से लेकर युवावस्था तक चार मुख्य चरणों से गुजरते हैं, जिनमें वे एक क्रमिक ढंग से अधिक जटिल मानसिक कार्यों को सीखते हैं। पियाजे ने यह भी सुझाव दिया कि संज्ञानात्मक विकास स्वाभाविक रूप से होता है और बच्चे अनुभवों के माध्यम से नए ज्ञान को स्वयं बनाते हैं।
इस प्रारंभिक अवस्था में बच्चे मुख्य रूप से अपनी इंद्रियों (दृष्टि, श्रवण, स्पर्श) और शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से सीखते हैं। इस अवधि में बच्चों को वस्तुओं का स्थायी अस्तित्व (object permanence) का ज्ञान होता है, अर्थात् वे यह समझ पाते हैं कि कोई वस्तु उनके दृष्टि से छुप जाने पर भी मौजूद होती है।
इस अवस्था में बच्चे प्रतीकों (symbols) और भाषा का उपयोग करना शुरू करते हैं। परन्तु उनकी सोच अभी भी स्वसंमुख (egocentric) होती है, जिसका अर्थ है कि वे दूसरों के दृष्टिकोण को समझने में असमर्थ होते हैं। तार्किक कारण समझने की क्षमता सीमित होती है।
यहाँ बच्चे तर्कशील (logical) सोच और सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं, परन्तु यह सोच ठोस वस्तुओं और अनुभवों तक सीमित रहती है। वे संरक्षण (conservation) जैसे मानसिक कौशल विकसित करते हैं, जिसमें वे समझते हैं कि मात्रा या संख्या वस्तु के रूप में नहीं बल्कि आकार और प्रस्तुति से स्वतंत्र होती है।
इस अंतिम अवस्था में बच्चे सार (abstract), संभावित (hypothetical) और तार्किक सोच की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। वे परिकल्पनाओं पर विचार कर सकते हैं, समस्याओं को समाधानात्मक ढंग से देख सकते हैं और मानसिक प्रयोग कर सकते हैं।
graph TD A[नया अनुभव] --> B{क्या अनुभव पहले से ज्ञात है?} B -- हाँ --> C[संयोजन] B -- नहीं --> D[मुताबकत] C --> E[मेषित ज्ञान] D --> E[मेषित ज्ञान] E --> F[संज्ञानात्मक संतुलन]पियाजे ने बताया कि बच्चे लगातार संतुलन की स्थिति खोजते रहते हैं, जहां उनकी मानसिक संरचनाएँ पर्यावरण के अनुरूप हों। असंतुलन (disequilibrium) होने पर वे अनुकूलन के माध्यम से संतुलन की ओर बढ़ते हैं। इस प्रक्रिया को संज्ञानात्मक विकास की मूल क्रिया माना जाता है।
चरण 1: समझें कि इस अवस्था (0-2 वर्ष) में बच्चे वस्तु स्थायी अस्तित्व सीखते हैं। इसका अर्थ है कि वे यह जानना शुरू कर देते हैं कि वस्तु उनकी आँखों से गायब होने पर भी मौजूद रहती है।
चरण 2: यदि खिलौना छुपा दिया जाता है, तो बच्चा उसे खोजने का प्रयास करेगा क्योंकि वह वस्तु के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर चुका है।
उत्तर: बच्चा छुपाए गए खिलौने को तलाश करेगा। यह वस्तु स्थायी अस्तित्व की समझ का संकेत है जो संवेदी-प्रयुक्त अवस्था की पहचान है।
चरण 1: 4 वर्ष के बच्चे की उम्र पूर्व-कैंसेप्चुअल अवस्था (2-7 वर्ष) में आती है।
चरण 2: इस अवस्था में बच्चे स्वसंमुख (egocentric) होते हैं, अर्थात वे केवल अपनी दृष्टि से सोचते हैं और अन्य लोगों के दृष्टिकोण को नहीं समझ पाते।
उत्तर: यह स्वसंमुखता पूर्व-कैंसेप्चुअल अवस्था की विशेषता है इसलिए बच्चा दूसरे की दृष्टि से सोचने में असमर्थ है।
चरण 1: यह समझना कि मात्रा या संख्या समान रहते हुए वस्तु का स्वरूप बदलने से उसकी मात्रा नहीं बदलती, संरक्षण कहलाता है।
चरण 2: संरक्षण की यह समझ कैंसेप्चुअल (Concrete Operational) अवस्था (7-11 वर्ष) में विकसित होती है।
उत्तर: बच्चा कैंसेप्चुअल अवस्था में है क्योंकि उसने संरक्षण की अवधारणा को सही ढंग से समझा है।
चरण 1: 13 वर्ष की उम्र आधार-कार्यान्वयन अवस्था (Formal Operational Stage) की है।
चरण 2: इस अवस्था में बच्चे सारात्मक, संभावित और तार्किक सोच विकसित करते हैं, जिससे वे जटिल समस्याओं का समाधान ढूंढ़ सकते हैं।
उत्तर: छात्र आधार-कार्यान्वयन अवस्था में है, जो संज्ञानात्मक विकास की अंतिम अवस्था है और तार्किक समस्याओं को सहजता से हल करने में सक्षम बनाती है।
चरण 1: जब नया अनुभव पहले से ज्ञात संरचना में रखा जाता है तो इसे संयोजन (Assimilation) कहते हैं।
चरण 2: अगर नया अनुभव फिट नहीं बैठता, तो बच्चा अपनी संरचना को बदलकर उसे समायोजित करता है, जिसे मुताबकत (Accommodation) कहा जाता है।
उत्तर: बच्चा सबसे पहले संयोजन की प्रक्रिया अपनाता है और जब यह संभव नहीं होता, तब वह मुताबकत करता है। इस प्रकार वह अपने ज्ञान का विकास करता है।
When to use: जब चार अवस्थाओं के क्रम को समझना हो।
When to use: प्रायः प्रश्नों में इन तीनों की प्रक्रिया पूछी जाती है।
When to use: स्वसंमुखता की अवधारणा और पूर्व-कैंसेप्चुअल अवस्था को याद रखने के लिए।
When to use: आलोचना और तुलना वाले प्रश्नों में सहायता के लिए।
When to use: संवेदी-प्रयुक्त अवस्था के प्रश्नों में
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